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भारत में मंगलसूत्र पहनने की परंपरा दक्षिण भारत से शुरू हुई थी। तमिलनाडु में इसे थिरू मंगलयम कहते हैं तो, उत्तर भारत में मंगलसूत्र।
ये असल में एक ताबीज के रूप में पहना जाता था जो कि वैवाहिक जीवन को बुरी बलाओं से बचाता है।
मंगलसूत्र बांधने की प्रथा लगभग 3000 ईसा पूर्व वैदिक युग के दौरान शुरू हुई थी। जहां इसे 'शुभ धागा' या 'मंगल्य सूत्रम' के रूप में जाना जाता था, जिसका संस्कृत में अर्थ 'शुभ धागा' है।
ये पति अपनी पत्नी को विवाह के दौरान पहनाता है।
दक्षिण भारतीयों का मानना है कि मंगलसूत्र को 3 गांठों में बांधना चाहिए और प्रत्येक गांठ का एक महत्व होता है, जैसे पति के प्रति वफादारी और सहयोग, परिवार के प्रति समर्पण और प्रभु के प्रति समर्पण।
ऐसा माना जाता है कि मंगलसूत्र के काली मोतियों में उनके वैवाहिक जीवन की रक्षा के लिए आध्यात्मिक शक्तियां होती हैं।
मंगलसूत्र में सोने की, काली और लाल मोतियों का इस्तेमाल होता है जो कि अलग-अलग ईश्वर और उनकी मान्यताओं के अनुसार जुड़ा हुआ है।
भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश और सीरियाई ईसाइयों में भी इसे पहनने की परंपरा है।
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